अंक ताक़तवर या माँ का विश्वास

अंकों से परे योग्यता

आजकल दसवीं व बारहवीं कक्षाओं के परिणाम घोषित हो चुके हैं या कुछ होने वाले हैं| हर तरह के मीडिया से नब्बे प्रतिशत से अधिक अंक पाने की ख़ुशी में अभिभावकों की ख़ुशी भी छलक रही है| स्वाभाविक है| हमें अगर पढ़कर इतनी ख़ुशी होती है तो उन्हें तो कई गुना ज्यादा ख़ुशी होगी ही| बच्चे भी इस तरह की ख़ुशी और बधाईयों के पूरे हक़दार हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है| ईश्वर उन्हें हमेशा सफलता के सोपानों पर आगे बढाता रहे, यही हमारी कामना है!

यहाँ इस लेख के ज़रिये मैं पाठकों व चिंतकों का ध्यान उन पचहत्तर प्रतिशत से भी अधिक छात्रों की मानसिक स्थिति की और खींचना चाहती हूँ जो सत्तर प्रतिशत अंक लेने से भी पीछे रह गए हैं| उनको  सांत्वना देने वाले शाब्दिक सांत्वना तो ज़रूर दे रहे होंगें पर उनकी आवाज़ का भारीपन

यह ज़रूर दिखा रहा होगा कि अब इस बेचारे का क्या होगा? क्या किसी अच्छे कॉलेज में इसे दाखिला मिल पायेगा? इसके कैरियर का क्या होगा?

अरे भई, इन अंकों से कुछ नहीं हो सकता तो न सही| पर हिम्मत रखने वालों की कभी हार नहीं होती| अगर आप किसी ऐसे ही छात्र के अभिभावक हैं या दोस्त/रिश्तेदार हैं तो यह लेख उस छात्र को अवश्य पढवाएं|

ऐसा ही एक छात्र था तेजस (बदला हुआ नाम पर सच्ची कहानी)| दसवीं तक वह बिना किसी ट्यूशन के पढ़ा और पिचासी प्रतिशत अंक लिए| दसवीं के बाद उसने घरवालों से कहा कि वह मेडिकल या नॉन मेडिकल नहीं पढ़ेगा क्योंकि उसके स्कूल का हर होनहार छात्र और छात्रा बी टेक करने या एम् बी बी एस करने को लालायित है| केवल कमज़ोर छात्र ही कॉमर्स पढ़ने को मजबूर हैं क्योंकि स्कूल उनको मेडिकल या नॉन मेडिकल में प्रवेश नहीं दे रहा (शायद कुछ अपवाद भी होंगें)| वह उसे भेड़चाल मान रहा था तथा अपने लिए कोई भी नया रास्ता खुद बनाना चाहता था| उसने अपने माता-पिता को विश्वास दिलाया कि वह ज़िन्दगी में जो भी रास्ता अपनाएगा उसमें वह बहुत ही बढ़िया काम करेगा| उन्हें बेटे पर विश्वास हो गया| कॉमर्स की पढ़ाई शुरू हो गई| जानकार लोग हैरान होकर पूछते कि आपका बेटा तो इंटेलीजेंट था फिर कॉमर्स क्यों दिलवाया! है न ख़ास सोच!

ग्यारहवीं व बारहवीं कक्षाओं में उसने किताबों को पढने की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया| वह अपने अन्दर और ज़रूरी स्किल्स विकसित कर रहा था| माता-पिता जानते थे| हर टेस्ट पर उनकी नज़र थी| जब वे उसे पढ़ने के लिए कहते तो बेटे का जवाब मिलता कि वह अच्छी तरह जानता है कि उसे क्या करना है| कभी वे आश्वस्त हो जाते तो कभी बिना आश्वस्त हुए चुप हो जाते क्योंकि वे बेटे के अन्दर निराशा की भावना नहीं भरना चाहते थे| वे यह जानते थे कि जिन लोगों का स्वभाव ही बन जाता है निराश व हताश रहना वे न तो खुद खुश रह सकते हैं और न ही उनका आगे आने वाला परिवार| इसलिए बेहतर है कि उसे ‘संतुष्ट व्यक्ति’ बनने दिया जाए| वह अपनी गलतियों से खुद ही सीखता जायेगा|

स्कूल के अध्यापकों द्वारा उसे अब कोई ख़ास अहमियत नहीं दी जाती थी| इस बात को लेकर कभी उसके अध्यापकों से बात होती तो वे कहते कि इस तरह से तो उसका स्कोर बहुत कम बनेगा| लेकिन उसकी माँ का जवाब होता कि मुझे स्कोर से ज़्यादा मतलब नहीं है मैं तो यह देख रही हूँ कि मेरे बच्चे में बाकि सभी गुण कितने विकसित हो रहे है और हम उससे संतुष्ट हैं| ऐसा सब वह इसलिए कहती कि वह अपने बेटे का शारीरिक विकास, दिमागी शक्ति तथा मनः स्थिति पर किसी तरह की कोई आंच नहीं आने देना चाहती थी| पर… जब बारहवीं का रिज़ल्ट आया तो केवल पैंसठ प्रतिशत! वैसे तो माता-पिता जानते थे कि कम अंक आयेंगें पर इतने कम आयेंगें यह तो कभी सोचा ही नहीं था| घर में उदासी…| पर स्थिति को भांपते हुए माता-पिता ने बेटे को सांत्वना दी और कहा कि कोई बात नहीं| अगर इस बार किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला नहीं हुआ तो दुबारा पेपर दे देना| लेकिन बेटा एक साल व्यर्थ करने को तैयार नहीं था और पूरा आश्वस्त था कि अगर उसे किसी छोटे मोटे कॉलेज में बी ए भी करनी पड़ी तो वह वही करेगा| फिर उसने अपना दृढ़ निश्चय दोहराया कि वह जिस क्षेत्र में भी जायेगा, बहुत बढ़िया करेगा|

संयोग से उसे सिम्बिओसिस यूनिवर्सिटी पुणे में दाखिले के लिए एंट्रेंस टेस्ट का पता चला तो उस दिन अंतिम तिथि थी| रात को बारह बजे से पहले खुद ही रजिस्ट्रेशन करा दिया| पेपर देने गया तो पता चला कि पूरे नार्थ इंडिया से कई हज़ार छात्र परीक्षा देने आए हुए थे| फिर निराशा! लेकिन उस जनरल नॉलेज टेस्ट में पूरे हरियाणा से केवल दो छात्र ही चुने गए| एक वह था| फिर वह आगे का रास्ता खुद बनाता गया पर अंकों में बढ़ोतरी नहीं हुई|

आज वह जिस स्तर पर पहुँच चुका है वहां तक उसके स्कूल से निकलने वाले करीब पंद्रह बैचेस में से कोई छात्र नहीं पहुंचा चाहे वे नब्बे प्रतिशत से ऊपर वाले थे या मेडिकल और नॉन मेडिकल वाले थे| पर उसके माता-पिता को एक अफ़सोस है कि उसके मन में अपने स्कूल के कुछ शिक्षकों के प्रति आज भी नाराज़गी है|

इसलिए मैं यह कहना चाहती हूँ कि आपका बच्चा आपका अपना है| उसे औरों के पीछे दौड़ने के लिए मत कहिये बल्कि जहाँ वह सहज अनुभव करता हो उधर ही रास्ता बनाने दीजिये और विश्वास रखिये कि वह ज़िन्दगी में बहुत अच्छा इंसान बनेगा|

Post Comment