कहानी – सैलाब… आहों के ताप का…

सैलाब…

…आहों के ताप का

 

हर पूर्णिमा की तरह आज भी चाँद पूरा चमक रहा था| दूर- दूर तक आसमां साफ़ दिखाई दे रहा था| सभी तारे टिमटिम टिमटिम करते हुए अपनी आभा बिखेर रहे थे| दूर… एक तारा टूटा| “आह!  पहले भी कई बार टूटा| कई मन्नते मांगी| पर, कुछ ना हुआ| आज एक बार फिर मांग लूँ! शायद पूरी हो जाए…!” ऐसा विचार मन में आते ही कौशल्या के दोनों हाथ जुड़ गए| आँखें बंद हो गई| होठों पर दबी आवाज़ में फुसफुसाहट होने लगी- “हे प्रभु, हमें इस दलदल से निकाल लो… निकाल लो प्रभु!”

कौशल्या के होठों पर फुसफुसाहट तो थोड़ी देर में बंद हो गई पर बंद आँखों से अश्रुधारा बह निकली| पलकें अभी भी बंद थीं| शायद अपने प्रभु को खोजने का प्रयत्न कर रही थीं क्योंकि खुली आँखों से तो दसों दिशाओं में जहान ही जहान नज़र आता है| प्रभु जिस रास्ते पर दीखते हों वह रास्ता तो दुनिया की चकाचौंध में कहीं ऐसे गुम हो जाता है मानो दिखाई दिया ही नहीं| या फिर, इतना सरल नज़र आता है कि इस पर चलना कोई बड़ा काम नहीं है| कभी भी इस रास्ते पर चलकर प्रभु को पकड़ ही लेंगें|

बंद आँखों में आज फिर वही दृश्य कौशल्या के सामने रह रह कर चमकीला हो रहा था| आज तक वह इसी दृश्य को नक्कारने की कोशिश करती रही थी| उस पर पर्दा डालने की कोशिश करती रही थी| पर पता नहीं क्या हुआ कि आज वह उस दृश्य को इस पूर्णिमा के चाँद की रोशनी में अच्छी तरह देखना चाहती थी| वह देख रही थी कि:

इतना बड़ा बंगला| बंगले की साज-संभाल के लिए पूरे बीस लोगों का स्टाफ| घर के सभी सदस्यों के लिए अलग अलग व्यक्तिगत नौकर, अलग अलग बड़ी बड़ी गाड़ियाँ, ड्राइवर, बैंक अकाऊंट आदि| अपनी किस्मत को प्रभु की ही दी सौगात समझकर हर रोज़ बंगले में ही बने मंदिर में नियम पूर्वक पूजा-पाठ करती थी| उसके प्रभु के भी ठाठ थे| सोने-चांदी के कलशों में रखे गंगाजल से स्नान करवाया जाता था| सोने चांदी के बर्तनों में छप्पन भोग लगवाया जाता था| सोने चांदी के तारों से बने पीताम्बार पहनाये जाते थे| सोने चांदी के बने मुकुट शीश पर चढ़ाये जाते थे| उसके प्रभु, प्रभु कम, कुबेर अधिक नज़र आते थे| आयें भी क्यों ना? कुबेर का खज़ाना जो था उनके चरणों के नीचे| सोने, चांदी, हीरे, जवाहरात और करेंसी के तो अम्बार लगे पड़े थे|

परन्तु कौशल्या के मन में ज़रा भी घमंड नहीं था| पूरे भक्ति-भाव से वह सब कुछ अपने प्रभु को अर्पण कर देती थी| खुद कुछ भी खाने से पहले प्रभु को भोग लगवाया करती थी| कोई नई साड़ी खरीदने से पहले प्रभु को नए पीताम्बर पहनाना अपना धार्मिक कर्त्तव्य समझती थी| यदा कदा घर में पूजा, पाठ, हवन आदि पूरी श्रद्धा से करवाती थी| शायद इसी वजह से उसके प्रभु उसके पति व इकलौते बेटे पर इतने मेहरबान थे| मेहरबान तो उसके प्रभु को होना ही था| आखिर और कौन ऐसा था दुनिया में प्रभु को कुबेर बना कर रखता हो? तो फिर प्रभु को तो उन पर शोहरत की ‘कृपा’ और समृद्धि की ‘बूँदें’ बरसानी ही थी|

लोग आते थे| अपने साथ अटैचियों में, मिठाई के डब्बों में, फल की टोकरियों में चढ़ावा भर भर कर लाते थे| सिर झुका झुका कर सलाम, नमस्ते कहते मानो थकते ही नहीं थे| उनके चेहरों की ख़ुशी इस बात का अहसास कराती थी कि वे दुनिया में अनंत प्यार व परोपकार बाँट रहे थे| समाज सेवा कर रहे थे| नई नौकरियां दिलवाना| पुरानी नौकरी में तरक्की दिलवाना| मनपसंद जगह पर तबादला करवाना| फेल हुओं को पास करवाना| योग्यता भले ही औरों से कम हो, क्या फर्क पड़ता है? आखिर उन्होंने अपने ‘प्रभु’ के चरणों में चढ़ावा चढ़ाया होता था| यह और बात थी कि कौशल्या उसे अपने प्रभु के हवाले कर देती थी| इसीलिए प्रभु के लिए भी तो उन्हें वैसा ही फल देना ज़रूरी होता था| इसीलिए सभी खुश होकर लौटते थे|

कौशल्या की बंद आँखों से जब ये दृश्य गुज़र रहे थे उस दौरान उसकी बंद आँखें भी चमक से भरपूर लग रही थीं| हालांकि अश्रुधारा का प्रवाह अब रुक गया था| रुकता भी कैसे नहीं? दुनिया की ख़ुशी में ही तो उसकी ख़ुशी थी| वह यह बात कैसे जान सकती थी कि वह तो केवल एक ‘कूप-मंडूक’ का जीवन ही जी रही थी? उसकी दुनिया केवल इतनी सी ही थी| वह नहीं जानती थी कि इस दुनिया के बाहर भी बहुत बड़ी दुनिया थी| बाहर की बड़ी दुनिया में हजारों लोग ऐसे थे जो अपनी किस्मत पर रो रहे थे|

उस बाहर की दुनिया में लोगों के पास योग्यता थी| बस अगर नहीं था तो चढ़ावे के लिए पैसा नहीं था| या फिर वो लोग जिन्हें अपनी योग्यता पर ‘गर्व’ था कि उन्हें मनचाही तरक्की, मनचाही नौकरी, मनपसंद जगह अवश्य मिल जाएगी| करते रहें ‘गर्व’! उनके पास ‘गर्व’ था तो फिर नौकरी की, तरक्की की या फिर मनपसंद जगह की क्या ज़रुरत थी क्योंकि उनके पास ‘गर्व’ जो था|

खैर! अचानक कौशल्या की आँखों की चमक मद्धम होने लगी| शायद अब उसके सामने दूसरा दृश्य लहराने लगा था| एक ऐसा दृश्य जिसमें वही ‘गर्व’ करने वाले लोग सिसक रहे थे| रो रो कर कुछ कहना चाहते थे पर शब्द जुबान पर आ ही नहीं रहे थे| उनका अपना गर्व, उनके माता-पिता का गर्व, उनकी पत्नी, बच्चों का गर्व, अब पिघल रहा था| नदिया के रूप में| नदिया बहती बहती समंदर में ढल रही थी| समंदर गहरा रहा था| उसमें और आँखों से निकली नदियाँआकर मिल रही थीं| समंदर फ़ैल रहा था|

कौशल्या का दिल बैठने लगा| उसे डर लगने लगा| नदियों से| समंदर से| सहसा उसने देखा कि समंदर में तूफ़ान उठ रहा था| लहरें उफन रही थीं| ऐसा लग रहा था कि जैसे समंदर की तली में ज्वालामुखी फूट पड़ा है| धरती के नीचे दबा धरती का ताप धरती पर जलजला लाना चाहता है| वह सोचने लगी कि आखिर ऐसा क्यों होता है? कब होता है?

फिर उसे ख्याल आने लगा कि यह ताप तो ‘आहों’ का है| उन आहों का जिन्हें उसने कभी देखा नहीं| सुना नहीं| महसूस करने का तो सवाल ही नहीं उठता| यह सैलाब उन आंसुओं का है जो उसके सामने कभी बहे ही नहीं| उन आहों का ‘ताप’ और उन आंसुओं का ‘सैलाब’ इतना बढ़ता जा रहा था कि सारे परिवार को अपनी लपेट में लेने को आतुर था| वह अपने ‘प्रभु’ को मनाती रही| पर, उसका ‘प्रभु’ तो ऐसे लग रहा था जैसे लम्बी तान कर सो रहा हो| उसकी चीख पुकार ‘प्रभु’ को सुनाई ही नहीं दे रही थी| देती भी कैसे क्योंकि अब उसके ‘प्रभु’ ने अपनी पीठ कौशल्या की तरफ फेर ली थी| अब ‘वह’ उसकी नहीं सुनना चाहता था| वह कह रहा था-

अब टूटें चाहे तारे सितारे जमीं पर,

न्याय होगा, होगा भी इसी जमीं पर|

कौशल्या की समझ में अब सब आ गया था| उसने धीरे से आँखें खोली| अब उन आँखों में न कोई चमक थी, न ही कोई गिला-शिकवा| थी तो बस एक शून्यता| तटस्थ शून्यता| वह शून्यता चमकती चांदनी की रोशनी में साफ़ झलक रही थी|

 

 

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