समाज सेवा का रूप

ईश्वर ने अमीर ग़रीब, ऊँच नीच का भेदभाव सृष्टि के निर्माण के साथ ही लागू कर दिया था। शायद इसी वजह से इंसान बुरे कर्म करने से कुछ हद तक डरता भी है। ये हमारे कर्मों का प्रभाव ही है कि कुछ लोग संसार में हर वैभव का आनंद उठाते हैं और कुछ लोग आवश्यक मूलभूत सुविधाएँ भी नहीं जुटा पाते। अब यहाँ यह तर्क भी दिया जा सकता है कि जो मेहनत करते हैं वे इच्छित प्राप्त कimageर लेते हैं तथा जिनके अंदर जुनून नहीं होता वे पीछे रह जाते हैं। हाँ, यह कुछ हद तक सही है पर किसी भी कार्य की सफलता तीन घटकों पर निर्भर करती है – करण, कारक और इष्ट।
इस विषय पर चर्चा तो काफी लंबी हो सकती है पर मेरी इस पोस्ट का उद्देश्य पूरा होना रह जाएगा। मैं अक्सर पढ़ती रहती हूँ कि कई सामाजिक संस्थाएँ वस्त्र वितरण करती रहती हैं। कई बार नए वस्त्र कंबल आदि तो कई बार पुराने वस्त्र। और, उन पुराने वस्त्रों को लेने वाले इस तरह झपट पड़ते हैं कि …। यह सब देखकर मैं काफी सोच में पड़ गई कि
-क्या यह सच में समाज सेवा है?
-क्या हमें इन लोगों को सभ्य बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए?
-क्या ऐसे लोगों को स्वाभिमान से ज़िंदगी जीने की शिक्षा नहीं देनी चाहिए?
-क्या ऐसे लोगों के लिए नई सोच के प्रोजेक्ट शुरू नहीं करने चाहिए?
-आदि और भी कई प्रश्न हैं जो जवाब ढूँढ रहे हैं…।
भारत विकास परिषद फतेहाबाद के ऐसे ही एक कार्यक्रम में शामिल होने का मौक़ा मिला। जो दिल व दिमाग़ को उद्वेलित कर गया। वही उद्वेलित भाव आप सब के साथ साँझा कर रही हूँ।
कृपया अपने विचार दीजिएगा।imageimage

Post Comment