हमसे है ज़माना

“हमसे है ज़माना , ज़माने से हम नहीं” के जय घोष के साथ महिला संगठन की सभा समाप्त हुई| सभी महिलाएं सीना फुलाए, लाल लाल होठों पर मुस्कान फैलाये अपनी अपनी सीट से उठ खड़ी हुईं| आगे की पंक्ति में बैठी महिलाओं ने मुड़कर पीछे की और देखा| हाल खचाखच भरा था| आयोजन कमेटी की महिलाओं को सभी ने घेर लिया तथा सफल आयोजन के लिए धन्यवाद दिया| आज तो देश की जानी मानी हस्तियों ने ज़ोरदार भाषण दिए थे| करीब एक दर्जन शक्तिशाली व सफल नारियां जो देश विदेश में नाम कमा रही थीं और नाम के साथ-साथ उनकी दौलत में भी बेशुमार वृद्धि हो रही थी, उन्होंने इन अबलाओं को सबल बनाने के तरीके सुझाये थे| अपनी अपनी जिंदगी से त्रस्त महिलाओं के मन में भी वीर रस हिलोरें मार रहा था|
सभा के बाद सीमा जैसे ही घर पहुंची उसकी छः साल की बच्ची ने फरमाइश कर दी पोहा खाने की| बेचारी ने कल रात से जो कुछ नहीं खाया था| सुबह उसकी मन नाश्ता भी नहीं बना सकी थी क्योंकि उन्हें महिला सभा में पहुँचने का सशर्त बुलावा मिला था| अगर वह बच्ची के लिए नाश्ता बनाने में लग जाती तो निश्चित ही सभा की अग्रिम पंक्ति की श्रोता बनने से वंचित रह जाती| और अब वह वापिस आकार वह थक चुकी थी| बच्ची की भूख की परवाह किये बिना ही उस पर थप्पड़ों की बौछार कर दी| उसकी बच्ची को इतनी सी समझ क्यों नहीं आई की अगर काम वाली बाई नहीं आई थी तो यह उसकी ज़िम्मेदारी बनती थी कि घर की सफाई कर देती और कुछ कपडे भी धो देती| नाश्ता करना था तो बर्तन तो हर हाल में ही मांजने चाहिए थे| इतने सारे अधूरे पड़े कामों की चिंता से तो वह और भी आक्रामक हो गई|
पति के दफ्तर से आते ही चाय का प्याला लाकर उनके आगे पटक दिया| बेचारे पति ने चेहरे के भावों पर नियंत्रण रखते हुए किसी तरह चाय गटकी| चाय में चीनी की जगह नमक के स्वाद को शांति से सहन कर लिया| बेचारा ‘न’ भी नहीं कर सका, क्योंकि महिला उत्थान संगठन की समर्थक ने जो बनाई थी|
चाय पीकर उसने लोक दिखावे वाले शेर के कपडे जल्दी से उतारे तथा घर में पहनने वाले गीदड़ के कपडे जल्दी से पहनकर रसोई में रखे जूठे बर्तनों की तरफ बढ़ गया| यह देख कर सीमा की आँखों में और कानों में सभा के दृश्य व ज़ोरदार भाषण टकराने लगे|
उसी सभा में मिसेज़ सूर्या खरे ने भी श्रोताओं को संबोधित किया था| वह इंदौर से स्पेशल आई थीं| यहाँ आने के लिए उन्हें इक्यावन हज़ार रूपये के साथ हवाई जहाज की टिकट, पांच सितारा होटल में कमरा तथा स्मृति चिन्ह के रूप में हीरे का नेकलेस दिया गया था| वैसे यह कोई ज़्यादा भी नहीं था| इतनी बड़ी हस्ती को अगर बुलाया गया था तो महिलाओं को जागृत करने के लिए ही न! वह इतना ज़ोरदार भाषण दे भी सकती थी और महिलाओं को सिखा भी सकती थी इस संगठन के लिए अधिक से अधिक फंड महिलाएं कैसे पति की जेब से इकट्ठे कर सकती हैं| अतः मिसेज़ खरे पर इतना खर्च करना सार्थक हो गया था क्योंकि कम से कम एक नारी – सीमा तो अपने अधिकारों के प्रति सजग हो रही थी|
हाँ, यह बात अलग थी कि समाज व परिवार पर उसका साइड इफेक्ट भी पड़ रहा था| पर इसकी परवाह करना सीमा का ही कर्त्तव्य नहीं | पूरे समाज व सरकार कि भी ज़िम्मेदारी बनती है कि बच्चों व पतियों के अधिकारों के लिए भी सभाओं का आयोजन करें| अगर वे न भी कर पायें तो भी कोई बात नहीं| महिला संगठन पीछे रहने वाला नहीं है| उनके लिए भी बाहर से वक्ता बुलाये जायेंगें| बच्चों व पतियों को भी सिखाया जायेगा कि वे महिलाओं के अधिकारों का मान कैसे रखें? क्योंकि – ‘ हमसे है ज़माना, ज़माने से हम नहीं’|
                           रिश्ता हमारा आपका कुछ ऐसा जुड़ गया,
कि हर तूफ़ाँ आ कर फिर पीछे मुड़ गया …को भी निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि केवल नेता लोग ही चुनावी मुर्गे की दावत नहीं उड़ा सकते| अगर वोटर भी सजग है तो अपना ‘हिस्सा’ ठोक बजा कर हासिल कर सकते हैं क्योंकि चुनावों के बाद तो सभी वादों पर पानी फिर जायेगा व बची खुची दावत को फ्रिज में रख दिया जायेगा| फिर हो सकता है की आपको बासी ही खाना पड़े|

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