A Review on Ram Mandir Babri Masjid – Judgement

आज दिनांक नवम्बर ९, २०१९ को दशकों से लम्बित अयोध्या में राम मंदिर व बाबरी मस्जिद केस का ऐतिहासिक व अत्यंत संतुलित फ़ैसला पंच-न्यायाधीश बेंच ने मुख्य न्यायाधीश माननीय श्री रंजन गोगोई जी की अगुवाई में सुनाया है।पूरे फ़ैसले को प्रथम दृष्टि से देखने पर ऐसा लगता है कि इतना आसान और अपेक्षित फ़ैसले को आने में इतना समय क्यों लगा? आपसी सहमति व समझबूझ से राष्ट्रहित में, ‘हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई’ की भावना को बनाए रखने के लिए इस विवाद को पहले ही सुलझाया जा सकता था। वैसे भी अगर दो पक्षों में विवाद होता है तो तथ्यों व सबूतों के आधार पर ही फ़ैसला दिया जाता है। अब सबूत मिले हैं कि वहाँ पर पहले राम मंदिर था तो क़ानूनी रूप से वहाँ राम मंदिर ही बनना चाहिए। बाबरी मस्जिद के पक्षधर अगर यह कहते हैं कि अगर ६ दिसम्बर १९९२ को बाबरी मस्जिद को ना तोड़ा गया होता तो क्या फ़ैसला होता? 

         मेरा यह मानना है कि बिलकुल यही फ़ैसला होना चाहिए था क्योंकि अगर मेरे पूर्वजों की ज़मीन पर कोई दूसरा अपना घर बना ले और उस ज़मीन में मेरे पूर्वजों की निशानियाँ मिल जाएँ तो तो दूसरे को अपना घर वहाँ से हटाना ही पड़ेगा। परंतु  दूसरे को भी बेघर नहीं करना चाहिए। उसका घर भी आसपास ही बनना चाहिए। इसलिए हमें न्याय का सम्मान करना चाहिए। माननीय प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी जी ने भी यही कहा है कि इसमें ना किसी की हार है ना किसी की जीत। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही इंसान हैं। ईश्वर ने दोनों को एक जैसा ही बनाया है। धर्मों में भेद तो इंसानों ने ही बनाए हैं। सभी के सिर, पैर और बाक़ी सभी अंग एक जैसे हैं।  अगर ईश्वर ने फ़र्क़ किया होता तो एक धर्म वालों के सिर ऊपर, दूसरे धर्म वालों के कंधे ऊपर, तीसरे धर्म वालों के पेट ऊपर या पैर आदि ऊपर बनाए होते।

           यह बात सही है कि सबके दिमाग़ अलग हैं। दिल अलग है। सोच अलग है। भगवान और अल्लाह अलग हैं। धर्म अलग हैं। और, सबको आज़ाद ज़िंदगी जीने का अधिकार भी बराबर है तो इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं कि हम दूसरे के धर्म को अनदेखा करें और स्वार्थ की ज़िंदगी जिएँ। 

          आओ हम सब मिलकर भाईचारा निभाएँ और मानवता को मज़बूत करें।   

उषा तनेजा ‘उत्सव’

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