पत्थरों को घिसना

बचपन बीत गया छोटे मोटे खेल में जवानी बीती ज़िंदगी की रेल में गहस्थी उलझी रही पत्नी और बच्चों बेल में बुढ़ापा आया तो ख़ुद को पाया अपने कर्मों की जेल में। सारा जीवन बीत गया खटते खटते काम में अपनों ने देखा तो पूछा क्या किया ज़िंदगी तमाम में? किस मुँह से कहें कि […]

तुम्हारा अहसास

कभी भेजा था तुमने एक ख़्याल खिला खिला सा मीठी खुशबु से भरा गुलाबी सी रंगत लिए नर्म नाज़ुक रेशमी स्पर्श वाला तुम्हारे छुअन के अहसास से भरा। मैंने भी संजो लिया था तुम्हारे उस अहसास को अपनी पसंद की किताब के पन्नों में ताकि रख सकूँ अपने पास बिल्कुल उसी तरह ज़िंदादिल चहकता हुआ […]

इश्क़ के क़िस्सों ने

इशक के क़िस्सों ने फिर साज़िशें की हैं फ़ना हमको करने की ख़्वाहिशें की हैं । ज़रा से ही टिके थे पाँव इस ज़माने में जगा कर प्यार फिर से आतिशें की हैं । जवानी की गीली गीली उन यादों में नहा करके गेसुओं ने बारिशें की हैं । हुआ था क़त्ल जिस गली के […]

क्यों? आपका क्या कहना है?

क्यों? आपका क्या कहना है? सूरज, चाँद, तारों से कह दो मेरे लिए चमकना छोड़ दें; क्योंकि अंधेरों ने मुझे अपने जाल में क़ैद कर रखा है। बुद्धु हैं वो लोग जो पल्लू से बाँध कर रखते हैं आशा; मुझ पर यक़ीन रखिए मैं हूँ आपकी प्यारी सी निराशा। Share this…