धूप का एक कतरा

मेरे अंगना में उतरा
धूप का एक कतरा
जाने कब से ठहरा है
मेरे अंगना में?
वो चाह रहा है
ख़त्म करना
मेरे घर के अंधियारे को,
पर मैं छिपाए जा रही हूँ
अपने घर के अंधियारे को…
ऐसे अंधियारे कोने
जहाँ मैंने छिपा रखे हैं
ना जाने कितने झूठ
ना जाने कितने फरेब
ना जाने और भी बहुत कुछ…
जो मैं छिपाना चाहती हूँ
दुनिया से,
अनजानों से,
अपनों से
और यहाँ तक कि
अपने आप से…
पर यह धूप का कतरा
मुझसे कह रहा है -
मुझे आने दो
उन अँधेरे कोनों में
अपना कर्त्तव्य निभाने दो
अँधेरा दूर करने का
हर अँधेरे कोने से…
यदि उन अंधेरों को
छिपाए रखोगी
इसी तरह
तो वो बढ़ते जायेंगें,
फिर मैं तो क्या
पूरा का पूरा सूरज भी
उन्हें मिटा ना पायेगा…
फिर रह जायेगा
केवल ताप
केवल संताप,
जिसमें तुम स्वयं जलोगी
औरों को भी जलाओगी,
शीतलता कहीं भी नहीं मिलेगी,
चांदनी से भी नहीं…
आज भी धूप का वही कतरा
मुझसे बातें कर रहा है
मांग रहा है इज़ाज़त,
मेरे घर के अंधियारे को दूर करने की…
पर मेरा मन है कि
घर बदलने को तैयार है
लेकिन उसे इज़ाज़त नहीं दे सकता,
क्योंकि मुझे मालूम है कि
वही धूप का कतरा
घर के अंधियारे कोने के बहाने
घुसना चाहता है
मेरे मन के कोनों में…

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