चिराग हूँ जल कर रौशनी कर रहा हूँ

चिराग हूँ जल कर रौशनी कर रहा हूँ
जल में रह कर तिश्नगी सह रहा हूँ|

समंदर हूँ, झीलें, ताल-तलैयां क्या
नदिया की मिठास खार कर रहा हूँ|

मेरे ख़ाक होने से रोशन सारा जहाँ
अपना पिछवाड़ा राख कर रहा हूँ|

ज़माने को हार कर चाहा जो तुम्हें
रुसवाइयों को अब याद कर रहा हूँ|

दिए तुमने कितने ही ताप-संताप
शीतलता की वही बात कर रहा हूँ|

संभाल कर रखा आज तक यादों को
भूलने की व्यर्थ बकवाद कर रहा हूँ|

ना शिकवा है ना शिकायत “उजास”
कज़ा बदलने की फ़रियाद कर रहा हूँ|

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