माँ तू तो है एक सरगम

‘सा’ से ‘सावन’ बन मेघा बरसे
मन के ‘रे’ से रेगिस्तान में|
मरुभूमि में जैसे हरियाले अंकुर फूटें
करके गहरे छेद पाषाण में|
माँ- तू तो है एक सरगम|

तू है सम्पूर्ण ‘गा’ से ‘गाथा ममता की’
उज्जवल करे जग बन कर ‘सारस’|
‘मा’ से माला देवों के ह्रदय पर, पर कभी
बेड़ियों में लिपटा ‘पा’ से पारस|
माँ- तू तो है एक सरगम|तुझ में बसते चारों ‘धा’ से धाम

मंदिर मस्जिद जाना सब निष्काम|
तेरा आंचल मेरी सारी दुनिया
‘नी’ से नीलकंठीनी ! हे उषा धाम!

क्योंकि
मेरा विष भी तूने पिया- हे क्षीरनिधि!
‘सा’ से अब सांझ हुई – हे सर्व सिद्धि!

माँ- तू तो है एक सरगम|

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