ग़ज़ल

नाज़ुक लम्हा इक प्यार का मन में मचलता रह गया,

उसके लबों पर नाम मेरा फिर फड़कता रह गया|

हैं दूरियां काफी अभी उस और मेरे दरमियाँ,

कल रात भर इन अंखियों से नीर बहता रह गया|

दिल तोड़ डाला और कुचला बन गयी वो बेवफ़ा,

मैं आज भी अपनी वफ़ा की डोर कसता रह गया|

…उषा तनेजा ‘उत्सव’

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